24 Oct 2026, Saturday | AB TAK NYAY – भारत का प्रमुख हिंदी दैनिक समाचार पत्र
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पत्रकार सुरक्षा कानून लागू करो, सच्चाई पर हमले बंद करो!

ब्यूरोचीफ
पत्रकार सुरक्षा कानून लागू करो, सच्चाई पर हमले बंद करो!
पत्रकार की हत्या पर एक करोड़ रुपये मुआवजा, आश्रित को तत्काल सरकारी नौकरी और पत्रकारों के परिवार को मुफ्त इलाज मिले: राजेश कुमार सिद्धार्थ
पत्रकारों के लिए न्यूनतम ₹30,000 मासिक मानदेय, जीवन एवं स्वास्थ्य बीमा, झूठे मुकदमों से संरक्षण और राष्ट्रीय पत्रकार कल्याण कोष स्थापित करने की मांग
रिपोर्ट: सुधीर वर्मा | राष्ट्रीय हिंदी दैनिक अब तक न्याय
नई दिल्ली। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली पत्रकारिता की स्वतंत्रता, पत्रकारों की सुरक्षा, सम्मान, आर्थिक स्थिरता और उनके परिवारों के भविष्य को लेकर पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। अंतरराष्ट्रीय प्रेस परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेश कुमार सिद्धार्थ ने केंद्र सरकार से मांग की है कि देशभर के पत्रकारों की सुरक्षा और कल्याण को ध्यान में रखते हुए प्रभावी पत्रकार सुरक्षा कानून बनाने की दिशा में शीघ्र ठोस पहल की जाए।
उन्होंने कहा कि पत्रकारिता केवल समाचार लिखने, तस्वीरें लेने, वीडियो बनाने या घटनाओं का प्रसारण करने तक सीमित नहीं है। पत्रकार समाज की समस्याओं को सामने लाने, जनता की आवाज शासन-प्रशासन तक पहुंचाने, सरकारी योजनाओं की वास्तविक स्थिति की पड़ताल करने, भ्रष्टाचार और अनियमितताओं से जुड़े मामलों को उजागर करने तथा लोकतांत्रिक व्यवस्था में जवाबदेही सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में पत्रकारों को भय, धमकी, हिंसा, अनुचित दबाव और आर्थिक असुरक्षा के बीच काम करने के लिए मजबूर नहीं होना चाहिए।
राजेश कुमार सिद्धार्थ ने केंद्र सरकार से विशेष रूप से मांग की कि पत्रकारों के लिए न्यूनतम ₹30,000 प्रतिमाह मानदेय की व्यवस्था करने की नीति बनाई जाए। पत्रकार की हत्या होने पर उसके पात्र आश्रित परिवार को एक करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता प्रदान करने का प्रावधान किया जाए। मृतक पत्रकार के पात्र आश्रित को तत्काल सरकारी नौकरी देने की व्यवस्था बने। इसके साथ ही पत्रकारों और उनके परिवारों को गंभीर बीमारी सहित आवश्यक चिकित्सा के लिए निःशुल्क इलाज की सुविधा उपलब्ध कराई जाए।
उन्होंने कहा कि पत्रकार सुरक्षा का अर्थ केवल किसी घटना के बाद कार्रवाई करना नहीं है, बल्कि ऐसी व्यवस्था तैयार करना भी है, जिसमें पत्रकार अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते समय सुरक्षित महसूस करें और किसी संकट की स्थिति में उनके परिवार को आर्थिक, सामाजिक तथा चिकित्सा संबंधी सहायता समय पर मिल सके।
उन्होंने केंद्र सरकार, संबंधित मंत्रालयों, संसद के सदस्यों और राज्य सरकारों से अपील की कि पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग पर व्यापक विचार-विमर्श किया जाए। पत्रकार संगठनों, स्वतंत्र पत्रकारों, ग्रामीण संवाददाताओं, छोटे समाचार पत्रों, स्थानीय समाचार चैनलों और डिजिटल मीडिया से जुड़े प्रतिनिधियों के सुझाव लेकर ऐसी व्यवस्था तैयार की जाए, जो व्यवहारिक, पारदर्शी और न्यायसंगत हो।
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1. पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग क्यों हो रही है तेज?
देश में पत्रकारिता का स्वरूप लगातार बदल रहा है। राष्ट्रीय समाचार पत्रों और बड़े समाचार चैनलों के साथ-साथ छोटे समाचार पत्र, क्षेत्रीय मीडिया संस्थान, डिजिटल न्यूज पोर्टल, स्थानीय टीवी चैनल, स्वतंत्र पत्रकार और ग्रामीण संवाददाता भी जनता तक सूचनाएं पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
गांवों में सड़क, नाली, पेयजल, बिजली, विद्यालय, अस्पताल, राशन वितरण, मनरेगा, आवास योजना, पेंशन, गौशालाओं की स्थिति और सरकारी योजनाओं में कथित अनियमितताओं जैसे विषयों को सामने लाने वाले स्थानीय पत्रकार अक्सर सीमित संसाधनों में काम करते हैं। कई बार उन्हें अपने ही क्षेत्र में प्रभावशाली लोगों, संबंधित पक्षों या अन्य व्यक्तियों के दबाव का सामना करना पड़ सकता है।
पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग उठाने वाले प्रतिनिधियों का कहना है कि पत्रकारों की सुरक्षा के लिए केवल मौखिक आश्वासन पर्याप्त नहीं हैं। ऐसी स्पष्ट कानूनी व्यवस्था की जरूरत है, जिसमें पत्रकारों के विरुद्ध हिंसा, धमकी, काम में बाधा और पत्रकारिता के कारण की जाने वाली दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई से संबंधित मामलों की निष्पक्ष जांच और समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके।
राजेश कुमार सिद्धार्थ के अनुसार, पत्रकारों की सुरक्षा को व्यापक दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। इसमें पत्रकार की व्यक्तिगत सुरक्षा, काम करने की स्वतंत्रता, आर्थिक स्थिति, चिकित्सा सुविधाएं, परिवार की सुरक्षा, कानूनी सहायता और संकट की स्थिति में आर्थिक सहयोग शामिल होना चाहिए।
उनका कहना है कि पत्रकारों को संरक्षण देने वाली किसी भी व्यवस्था में यह स्पष्ट होना चाहिए कि पत्रकारिता से जुड़े मामलों में निष्पक्ष जांच कैसे होगी, शिकायतों पर कार्रवाई कौन करेगा, पीड़ित पत्रकार को सहायता कैसे मिलेगी और दोष सिद्ध होने पर संबंधित व्यक्ति के विरुद्ध कानून के अनुसार क्या कार्रवाई होगी।
पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग का उद्देश्य किसी को कानून से ऊपर रखना नहीं, बल्कि जनहित में पत्रकारिता करने वाले व्यक्तियों को अनुचित दबाव और हिंसा से बचाने के लिए प्रभावी व्यवस्था विकसित करना है।
2. पत्रकार की हत्या पर एक करोड़ रुपये मुआवजा देने की मांग
पत्रकार सुरक्षा से जुड़ी प्रमुख मांगों में पत्रकार की हत्या होने पर उसके परिवार को पर्याप्त आर्थिक सहायता देने का प्रस्ताव शामिल है।
अंतरराष्ट्रीय प्रेस परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेश कुमार सिद्धार्थ ने मांग की कि यदि किसी पत्रकार की हत्या उसके पत्रकारिता संबंधी कार्य, जनहित में की गई रिपोर्टिंग या सच्चाई उजागर करने के कारण होती है, तो मामले की निष्पक्ष जांच की जाए। पत्रकारिता से संबंधित हत्या की पुष्टि होने और निर्धारित पात्रता एवं कानूनी प्रक्रिया पूरी होने पर मृतक पत्रकार के आश्रित परिवार को एक करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता देने का प्रावधान बनाया जाए।
उनका कहना है कि परिवार का कमाने वाला सदस्य अचानक दुनिया से चला जाता है, तो उसके पीछे बच्चों की पढ़ाई, आवास, भोजन, चिकित्सा, पारिवारिक जिम्मेदारियों और भविष्य की अनेक समस्याएं खड़ी हो जाती हैं। यदि मृतक पत्रकार की आय ही परिवार की आजीविका का प्रमुख आधार थी, तो उसकी मृत्यु के बाद परिवार को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ सकता है।
ऐसी स्थिति में सरकार की ओर से पर्याप्त आर्थिक सहायता परिवार को संभलने का अवसर दे सकती है। इसीलिए पत्रकार की हत्या के मामलों में सहायता राशि के संबंध में स्पष्ट नीति बनाने की जरूरत है।
राजेश कुमार सिद्धार्थ ने मांग की कि सहायता प्राप्त करने की प्रक्रिया सरल, पारदर्शी और समयबद्ध होनी चाहिए। पीड़ित परिवार को अनावश्यक कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़ें। आवेदन की जांच, पात्रता निर्धारण और सहायता स्वीकृति के लिए निर्धारित समयसीमा तय की जाए।
उन्होंने यह भी कहा कि सहायता का प्रावधान बनाते समय पत्रकार की हत्या और उसके पेशेवर कार्य के बीच संबंध की जांच निष्पक्ष साक्ष्यों के आधार पर की जानी चाहिए। केवल आरोप के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के बजाय विधिसम्मत जांच की जाए और पात्र परिवार को समय पर राहत मिले।
प्रमुख मांग: पत्रकार की हत्या उसके पत्रकारिता संबंधी कार्य के कारण होने की पुष्टि पर पात्र आश्रित परिवार को एक करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने के लिए स्पष्ट कानूनी और प्रशासनिक व्यवस्था बनाई जाए।
3. मृतक पत्रकार के आश्रित को तत्काल सरकारी नौकरी मिले
पत्रकार की हत्या या ड्यूटी के दौरान मृत्यु होने पर परिवार के सामने केवल आर्थिक सहायता का सवाल नहीं होता। परिवार के भविष्य, बच्चों की शिक्षा, नियमित आय और सामाजिक सुरक्षा की समस्या भी उत्पन्न हो सकती है।
राजेश कुमार सिद्धार्थ ने केंद्र और राज्य सरकारों से मांग की कि पत्रकार की हत्या उसके पत्रकारिता संबंधी कार्य के कारण होने की पुष्टि की स्थिति में मृतक पत्रकार के पात्र आश्रित परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने की नीति बनाई जाए।
उन्होंने कहा कि पत्रकार अपने परिवार की जिम्मेदारियों के साथ समाज के प्रति भी दायित्व निभाते हैं। यदि जनहित में काम करने वाले पत्रकार को अपनी जिम्मेदारी निभाते समय जान गंवानी पड़ती है, तो उसके परिवार को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए।
सरकारी नौकरी से संबंधित व्यवस्था में पात्रता, शैक्षणिक योग्यता, आयु, पद की उपलब्धता और लागू सेवा नियमों को ध्यान में रखते हुए एक स्पष्ट प्रक्रिया निर्धारित की जा सकती है। इसके लिए विशेष नीति या विधिसम्मत प्रावधान की आवश्यकता पर विचार किया जाना चाहिए।
उनकी मांग है कि मृतक पत्रकार के आश्रित को सहायता प्राप्त करने के लिए लंबी और जटिल प्रक्रियाओं में न उलझना पड़े। संबंधित विभाग द्वारा मामले की जांच पूरी होने के बाद आवेदन पर समयबद्ध निर्णय लिया जाए और पात्र परिवार को आवश्यक सहायता प्रदान की जाए।
उन्होंने यह भी कहा कि नौकरी के साथ परिवार को तत्काल अंतरिम आर्थिक सहायता, बच्चों की शिक्षा में सहयोग और आवश्यक सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध कराने के विकल्पों पर विचार होना चाहिए।
पत्रकार के परिवार को सम्मानजनक जीवन उपलब्ध कराना केवल सहायता देने का मामला नहीं, बल्कि उस व्यक्ति के योगदान को मान्यता देने का भी विषय है, जिसने समाज तक सूचना पहुंचाने के लिए अपनी जिम्मेदारी निभाई।
4. पत्रकार बीमार हो तो पूरे परिवार को निःशुल्क इलाज मिले
पत्रकारों के लिए चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता एक महत्वपूर्ण विषय है। अनेक छोटे समाचार पत्रों, स्थानीय चैनलों, स्वतंत्र मीडिया संस्थानों और ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले पत्रकारों के पास नियमित स्वास्थ्य बीमा या पर्याप्त चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं हो सकती।
बीमारी की स्थिति में अस्पताल, जांच, दवाइयों, ऑपरेशन और लंबे उपचार पर होने वाला खर्च परिवार की आर्थिक स्थिति को प्रभावित कर सकता है। गंभीर बीमारी की स्थिति में पत्रकार के लिए काम जारी रखना भी कठिन हो सकता है।
राजेश कुमार सिद्धार्थ ने मांग की कि पत्रकारों और उनके आश्रित परिवारों के लिए ऐसी व्यवस्था बनाई जाए, जिसके अंतर्गत निर्धारित पात्रता और नियमों के अनुसार निःशुल्क एवं समुचित चिकित्सा सुविधा उपलब्ध हो।
उन्होंने कहा कि पत्रकार ही नहीं, बल्कि उसके परिवार के सदस्य भी स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना कर सकते हैं। इसलिए पत्रकार सुरक्षा और कल्याण नीति में पति या पत्नी, बच्चों तथा पात्र आश्रितों को भी शामिल किया जाना चाहिए।
प्रस्तावित व्यवस्था के अंतर्गत सरकारी अस्पतालों में प्राथमिकता के आधार पर आवश्यक उपचार, गंभीर बीमारियों के लिए विशेष सहायता, निर्धारित अस्पतालों में कैशलेस इलाज, आवश्यक जांच और दवाइयों की सुविधा जैसे विकल्पों पर विचार किया जा सकता है।
इसके साथ ही जीवन बीमा और स्वास्थ्य बीमा की व्यवस्था भी प्रभावी बनाई जानी चाहिए, ताकि दुर्घटना, गंभीर बीमारी या अस्पताल में भर्ती होने की स्थिति में परिवार को आर्थिक संकट का सामना न करना पड़े।
राजेश कुमार सिद्धार्थ का कहना है कि इलाज के लिए सहायता प्राप्त करने की प्रक्रिया इतनी सरल होनी चाहिए कि बीमार पत्रकार या उसका परिवार संकट के समय आवश्यक चिकित्सा से वंचित न रहे।
मांग: पत्रकारों और उनके पात्र आश्रित परिवारों के लिए निःशुल्क चिकित्सा, स्वास्थ्य बीमा तथा गंभीर बीमारियों के उपचार हेतु प्रभावी सहायता व्यवस्था लागू की जाए।
5. पत्रकारों को कम से कम ₹30,000 मासिक मानदेय मिले
पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग के साथ आर्थिक सुरक्षा का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। पत्रकारों को नियमित और सम्मानजनक पारिश्रमिक मिलना उनकी कार्यक्षमता तथा पेशेवर स्वतंत्रता के लिए आवश्यक है।
राजेश कुमार सिद्धार्थ ने मांग की कि पात्र पत्रकारों के लिए न्यूनतम ₹30,000 प्रतिमाह मानदेय सुनिश्चित करने के उद्देश्य से सरकार स्पष्ट नीति बनाए।
उनका कहना है कि अनेक पत्रकार अपने संसाधनों से मोटरसाइकिल या अन्य वाहन के माध्यम से घटनास्थल तक पहुंचते हैं। उन्हें मोबाइल फोन, इंटरनेट, कैमरा, रिकॉर्डिंग उपकरण, यात्रा, समाचार संकलन और अन्य आवश्यक खर्च स्वयं उठाने पड़ सकते हैं।
ग्रामीण और जिला स्तर पर कार्यरत संवाददाताओं की जिम्मेदारियां भी व्यापक होती हैं। उन्हें दुर्घटनाओं, जनसमस्याओं, सरकारी कार्यक्रमों, प्रशासनिक गतिविधियों और स्थानीय घटनाओं की सूचना जुटाने के लिए लगातार क्षेत्र में काम करना पड़ता है।
यदि किसी पत्रकार को नियमित आय नहीं मिलती या पारिश्रमिक उसकी जिम्मेदारियों की तुलना में बहुत कम होता है, तो उसके सामने परिवार चलाने और पेशेवर दायित्व निभाने के बीच कठिनाई उत्पन्न हो सकती है।
राजेश कुमार सिद्धार्थ ने कहा कि पत्रकारों के पारिश्रमिक के लिए नीति बनाते समय उनके कार्य के स्वरूप, रोजगार संबंध, अनुभव, काम के समय और जिम्मेदारियों को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
उन्होंने विशेष रूप से ग्रामीण संवाददाताओं, छोटे समाचार पत्रों, स्वतंत्र पत्रकारों और क्षेत्रीय मीडिया संस्थानों से जुड़े पात्र पत्रकारों की स्थिति पर ध्यान देने की मांग की।
प्रस्तावित नीति में लिखित अनुबंध, भुगतान की पारदर्शिता, समय पर मानदेय और शिकायत निवारण की व्यवस्था भी शामिल की जा सकती है। इससे पत्रकारों को अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों की स्पष्ट जानकारी मिल सकेगी।
यह मांग सरकार से संबंधित प्रस्ताव के रूप में रखी गई है। न्यूनतम ₹30,000 मासिक मानदेय को लागू करने के लिए पात्रता, वित्तीय व्यवस्था और संबंधित कानूनी ढांचे पर निर्णय लिया जाना आवश्यक होगा।
6. ग्रामीण पत्रकारों की आर्थिक स्थिति पर विशेष ध्यान देने की जरूरत
भारत में स्थानीय पत्रकारिता का महत्वपूर्ण स्थान है। राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित विषयों के साथ-साथ गांवों की छोटी-छोटी समस्याएं भी जनता के जीवन को सीधे प्रभावित करती हैं।
किसी गांव में सड़क नहीं बनी, विद्यालय में शिक्षक अनुपस्थित हैं, अस्पताल में दवाइयों की कमी है, पेयजल की समस्या है, पात्र व्यक्ति को पेंशन नहीं मिल रही है या किसी सरकारी योजना में अनियमितता की शिकायत है, तो इन समस्याओं को सार्वजनिक करने में ग्रामीण पत्रकार महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
कई ग्रामीण पत्रकार सीमित संसाधनों में काम करते हैं। उन्हें नियमित वेतन, बीमा, कानूनी सहायता और संस्थागत सहयोग उपलब्ध न होने की समस्या का सामना करना पड़ सकता है।
राजेश कुमार सिद्धार्थ ने मांग की कि पत्रकार सुरक्षा कानून में ग्रामीण पत्रकारिता को विशेष रूप से ध्यान में रखा जाए। पत्रकार की पहचान और पात्रता निर्धारित करने के लिए स्पष्ट, पारदर्शी और न्यायसंगत मानदंड तैयार किए जाएं।
इस व्यवस्था में केवल बड़े समाचार संस्थानों के कर्मचारियों तक लाभ सीमित न रहे। स्वतंत्र पत्रकारों, छोटे समाचार पत्रों, स्थानीय चैनलों और डिजिटल मीडिया से जुड़े वास्तविक पत्रकारों को भी निर्धारित नियमों के अंतर्गत शामिल करने पर विचार किया जाए।
साथ ही, फर्जी पहचान के माध्यम से अनुचित लाभ लेने की संभावना रोकने के लिए उचित सत्यापन प्रक्रिया भी आवश्यक है। सत्यापन की प्रक्रिया निष्पक्ष होनी चाहिए और छोटे मीडिया संस्थानों से जुड़े वास्तविक पत्रकारों के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए।
7. पत्रकारों पर हमले और धमकियों के मामलों में त्वरित कार्रवाई हो
पत्रकारों को समाचार संकलन के दौरान विभिन्न परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। विवादित घटनाओं, अपराध, अवैध गतिविधियों, प्रशासनिक शिकायतों और जनहित के मामलों की रिपोर्टिंग करते समय कभी-कभी तनावपूर्ण स्थिति पैदा हो सकती है।
पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग करने वाले प्रतिनिधियों का कहना है कि पत्रकार पर हमला, जान से मारने की धमकी, कैमरा या उपकरण छीनना, रिपोर्टिंग में बाधा डालना और जबरन दबाव बनाना जैसे मामलों में शिकायत मिलने पर त्वरित तथा निष्पक्ष कार्रवाई होनी चाहिए।
राजेश कुमार सिद्धार्थ ने मांग की कि पत्रकारों के विरुद्ध हिंसा या धमकी के मामलों के लिए स्पष्ट शिकायत निवारण तंत्र विकसित किया जाए। शिकायत प्राप्त होने पर उसका रिकॉर्ड रखा जाए, जोखिम की स्थिति का आकलन किया जाए और कानून के अनुसार आवश्यक सुरक्षा तथा जांच संबंधी कदम उठाए जाएं।
उन्होंने यह भी कहा कि गंभीर मामलों में जांच और न्यायिक प्रक्रिया अनावश्यक रूप से लंबित न रहे। मामलों के शीघ्र निस्तारण के लिए समयबद्ध जांच, प्रभावी अभियोजन और आवश्यकतानुसार विशेष न्यायिक व्यवस्था की संभावनाओं पर विचार किया जाए।
हालांकि, किसी मामले में दोष निर्धारित करना न्यायिक प्रक्रिया और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही होना चाहिए। पत्रकार होने के कारण किसी व्यक्ति को कानून से ऊपर नहीं रखा जा सकता, लेकिन पत्रकारिता के कारण किसी के साथ गैरकानूनी हिंसा या उत्पीड़न भी स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।
8. पत्रकारों के विरुद्ध झूठे और दुर्भावनापूर्ण मुकदमों पर रोक लगे
पत्रकारों की एक प्रमुख मांग यह है कि जनहित में प्रकाशित या प्रसारित समाचारों के कारण दर्ज कराए जाने वाले कथित झूठे अथवा दुर्भावनापूर्ण मामलों की निष्पक्ष जांच हो।
राजेश कुमार सिद्धार्थ ने कहा कि यदि किसी समाचार से संबंधित शिकायत प्राप्त होती है, तो उसकी जांच कानून के अनुसार तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर की जानी चाहिए। किसी पत्रकार को केवल दबाव बनाने या समाचार हटवाने के उद्देश्य से कानूनी प्रक्रिया में उलझाने की कोशिश की जाती है, तो ऐसी शिकायतों के दुरुपयोग को रोकने के लिए प्रभावी उपाय होने चाहिए।
उन्होंने मांग की कि पत्रकारिता से जुड़े मामलों में शिकायतों की निष्पक्ष समीक्षा, कानूनी सहायता और जवाबदेही की व्यवस्था बनाई जाए। दुर्भावनापूर्ण शिकायत साबित होने की स्थिति में लागू कानून के अनुसार उचित कार्रवाई की जा सके।
पत्रकार संगठनों की ओर से पुलिस अधीक्षक स्तर के अधिकारी की पूर्व समीक्षा जैसी व्यवस्था पर विचार करने की मांग भी उठाई जा सकती है। हालांकि, ऐसी किसी व्यवस्था को लागू करने से पहले यह सुनिश्चित करना जरूरी होगा कि वास्तविक अपराधों की जांच, पीड़ितों के अधिकार और न्याय तक पहुंच प्रभावित न हों।
पत्रकार सुरक्षा का अर्थ शिकायतों से पूर्ण छूट नहीं है। इसका उद्देश्य ऐसी निष्पक्ष व्यवस्था विकसित करना है, जिसमें पत्रकारिता की स्वतंत्रता सुरक्षित रहे और प्रत्येक शिकायत की जांच कानून के अनुसार हो।
9. समाचार स्रोतों की गोपनीयता को कानूनी संरक्षण मिले
खोजी पत्रकारिता में समाचार स्रोतों का महत्वपूर्ण योगदान होता है। कई बार सरकारी कामकाज, भ्रष्टाचार, सार्वजनिक धन के उपयोग या अन्य जनहित के विषयों से जुड़ी जानकारी ऐसे व्यक्तियों के माध्यम से सामने आती है, जो अपनी पहचान सार्वजनिक नहीं करना चाहते।
यदि किसी स्रोत की पहचान अनावश्यक रूप से उजागर होती है, तो संबंधित व्यक्ति की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है और भविष्य में अन्य लोग भी महत्वपूर्ण जानकारी साझा करने से हिचक सकते हैं।
राजेश कुमार सिद्धार्थ ने मांग की कि पत्रकारिता में समाचार स्रोतों की गोपनीयता से जुड़े मुद्दों पर स्पष्ट कानूनी प्रावधानों और उचित सुरक्षा उपायों पर विचार किया जाए।
उन्होंने कहा कि किसी स्रोत की जानकारी मांगने या उसे सार्वजनिक करने की स्थिति में लागू कानून, आवश्यक कानूनी प्रक्रिया और संबंधित व्यक्तियों के अधिकारों को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
इस विषय पर कानून बनाते समय पत्रकारिता की स्वतंत्रता, जांच की आवश्यकताओं, न्यायिक प्रक्रिया और सार्वजनिक हित के बीच संतुलन स्थापित करना महत्वपूर्ण होगा।
10. पत्रकारों के लिए राष्ट्रीय पत्रकार कल्याण कोष बनाया जाए
पत्रकार सुरक्षा की मांग केवल हमलों से बचाव तक सीमित नहीं है। आर्थिक संकट, दुर्घटना, बीमारी, कानूनी खर्च और परिवार की कठिन परिस्थितियों में सहायता उपलब्ध कराना भी महत्वपूर्ण है।
राजेश कुमार सिद्धार्थ ने राष्ट्रीय स्तर पर पत्रकार कल्याण कोष स्थापित करने की मांग की। इसके साथ ही राज्यों में भी प्रभावी पत्रकार कल्याण निधि विकसित करने के विकल्पों पर विचार करने की अपील की।
प्रस्तावित कोष से पात्र पत्रकारों को निम्न परिस्थितियों में सहायता देने की व्यवस्था बनाई जा सकती है:
1. ड्यूटी के दौरान दुर्घटना होने पर आर्थिक सहायता।2. गंभीर चोट या स्थायी दिव्यांगता की स्थिति में सहायता।3. गंभीर बीमारी और महंगे उपचार के लिए सहायता।4. पत्रकारिता संबंधी कार्य के कारण हिंसा का शिकार होने पर सहायता।5. पत्रकार की मृत्यु होने पर पात्र आश्रित परिवार को राहत।6. बच्चों की शिक्षा और आश्रित परिवार की कठिन परिस्थितियों में नियमानुसार सहायता।7. आवश्यक कानूनी सहायता और संकट के समय अस्थायी सहयोग।
उन्होंने कहा कि कोष का संचालन पारदर्शी नियमों के अनुसार होना चाहिए। आवेदन की पात्रता, दस्तावेज, सहायता की राशि, स्वीकृति की प्रक्रिया और भुगतान की समयसीमा स्पष्ट रूप से निर्धारित की जाए।
कोष के उपयोग का नियमित लेखा-परीक्षण और सार्वजनिक जवाबदेही भी सुनिश्चित की जानी चाहिए, ताकि सहायता वास्तविक जरूरतमंद पत्रकारों और उनके परिवारों तक पहुंच सके।
11. जीवन बीमा और दुर्घटना बीमा की व्यवस्था हो
पत्रकारिता के काम में कई बार सड़क दुर्घटनाओं, प्राकृतिक आपदाओं, हिंसक घटनाओं या अन्य अप्रत्याशित परिस्थितियों का जोखिम हो सकता है। रिपोर्टिंग के लिए दूर-दराज के क्षेत्रों में जाने वाले पत्रकारों के लिए दुर्घटना और जीवन बीमा उपयोगी सुरक्षा उपाय हो सकते हैं।
राजेश कुमार सिद्धार्थ ने मांग की कि पात्र पत्रकारों के लिए किफायती अथवा सरकारी सहायता प्राप्त जीवन बीमा और दुर्घटना बीमा की व्यवस्था विकसित की जाए।
उन्होंने कहा कि पत्रकार की मृत्यु या गंभीर दुर्घटना की स्थिति में परिवार को केवल कागजी औपचारिकताओं के कारण सहायता से वंचित नहीं होना चाहिए। बीमा दावों की जांच पारदर्शी हो और पात्र दावों का निस्तारण निर्धारित समय में किया जाए।
इसके साथ ही पत्रकारों को बीमा योजनाओं, उनके लाभ, पात्रता, अपवाद और दावा प्रक्रिया के बारे में सरल भाषा में जानकारी उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
पत्रकार संगठनों और मीडिया संस्थानों को भी अपने स्तर पर पत्रकारों के लिए बीमा तथा आपातकालीन सहायता की व्यवस्था विकसित करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है।
12. छोटे समाचार पत्रों और स्थानीय चैनलों से जुड़े पत्रकारों को भी मिले लाभ
देश में बड़ी मीडिया कंपनियों के साथ-साथ अनेक छोटे समाचार पत्र, क्षेत्रीय चैनल और डिजिटल मीडिया संस्थान भी काम कर रहे हैं। स्थानीय स्तर पर इन संस्थानों से जुड़े पत्रकार जनता तक खबरें पहुंचाते हैं।
राजेश कुमार सिद्धार्थ ने मांग की कि पत्रकार सुरक्षा और कल्याण संबंधी योजनाओं का लाभ केवल बड़े संस्थानों तक सीमित न रखा जाए। छोटे समाचार पत्रों और स्थानीय चैनलों से जुड़े पात्र पत्रकारों के लिए भी उचित व्यवस्था हो।
उनके अनुसार, पत्रकार की पात्रता तय करने के लिए कार्य का प्रमाण, प्रकाशित या प्रसारित समाचार, संस्थान से संबंध, स्वतंत्र पत्रकारिता का रिकॉर्ड और अन्य प्रासंगिक दस्तावेज जैसे मानदंड अपनाए जा सकते हैं।
मानदंडों का उद्देश्य वास्तविक पत्रकारों को पहचान देना होना चाहिए, न कि छोटे संस्थानों के पत्रकारों को अनावश्यक रूप से बाहर करना।
साथ ही, योजनाओं का लाभ लेने के लिए फर्जी पहचान-पत्र या गलत दस्तावेज प्रस्तुत करने की स्थिति में उचित जांच और कार्रवाई की व्यवस्था भी होनी चाहिए।
13. महिला पत्रकारों की सुरक्षा पर भी विशेष ध्यान दिया जाए
महिला पत्रकारों को भी समाचार संकलन, कार्यालय, यात्रा और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर काम करते समय सुरक्षा संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
पत्रकार सुरक्षा कानून की प्रस्तावित व्यवस्था में महिला पत्रकारों के लिए सुरक्षित कार्यस्थल, शिकायत निवारण, यौन उत्पीड़न से संबंधित लागू कानूनों का पालन, आवश्यक सुरक्षा सहायता और गोपनीयता की रक्षा जैसे विषयों को उचित स्थान दिया जाना चाहिए।
राजेश कुमार सिद्धार्थ की मांगों के संदर्भ में यह भी महत्वपूर्ण है कि सुरक्षा संबंधी किसी व्यवस्था में महिला और पुरुष पत्रकारों के साथ समानता तथा गरिमा का व्यवहार सुनिश्चित हो।
रात्रिकालीन रिपोर्टिंग, दूरस्थ क्षेत्रों में यात्रा और संवेदनशील घटनाओं की कवरेज के दौरान जोखिम का आकलन करने और जरूरत पड़ने पर सहायता उपलब्ध कराने के लिए मीडिया संस्थानों की जिम्मेदारी भी स्पष्ट की जा सकती है।
14. डिजिटल मीडिया और स्वतंत्र पत्रकारों के लिए स्पष्ट मानदंड बनें
आज समाचार केवल मुद्रित समाचार पत्र या पारंपरिक टीवी चैनलों के माध्यम से ही नहीं पहुंचते। डिजिटल न्यूज पोर्टल, वीडियो प्लेटफॉर्म और अन्य ऑनलाइन माध्यम भी समाचारों के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
इन माध्यमों से जुड़े पत्रकारों की कार्य-स्थिति अलग-अलग हो सकती है। कुछ पत्रकार किसी संस्थान के कर्मचारी होते हैं, कुछ अनुबंध पर काम करते हैं और कुछ स्वतंत्र रूप से समाचार संकलन करते हैं।
राजेश कुमार सिद्धार्थ ने मांग की कि पत्रकार सुरक्षा और कल्याण की प्रस्तावित व्यवस्था में डिजिटल मीडिया तथा स्वतंत्र पत्रकारों की पात्रता स्पष्ट की जाए।
पात्रता निर्धारित करते समय केवल किसी सोशल मीडिया खाते या पहचान-पत्र को पर्याप्त मानने के बजाय वास्तविक पत्रकारिता कार्य, प्रकाशित सामग्री, कार्य का रिकॉर्ड और अन्य उचित प्रमाणों पर विचार किया जा सकता है।
इससे वास्तविक पत्रकारों को योजनाओं का लाभ देने और फर्जी दावों को रोकने के बीच संतुलन स्थापित करने में मदद मिल सकती है।
15. पत्रकारों को कानूनी सहायता उपलब्ध कराई जाए
किसी समाचार के कारण कानूनी विवाद उत्पन्न होने पर पत्रकार को वकील, दस्तावेज और न्यायिक प्रक्रिया से संबंधित खर्च उठाना पड़ सकता है। सीमित आय वाले पत्रकारों के लिए यह खर्च कठिनाई पैदा कर सकता है।
राजेश कुमार सिद्धार्थ ने मांग की कि पात्र पत्रकारों के लिए कानूनी सहायता की व्यवस्था पर विचार किया जाए। इसके अंतर्गत पत्रकारिता संबंधी मामलों में प्रारंभिक कानूनी परामर्श, उपयुक्त मामलों में अधिवक्ता की सहायता और संबंधित कानूनी प्रक्रिया की जानकारी उपलब्ध कराई जा सकती है।
उन्होंने कहा कि कानूनी सहायता का उद्देश्य निष्पक्ष न्याय प्रक्रिया को मजबूत करना होना चाहिए। प्रत्येक मामले का मूल्यांकन तथ्यों, उपलब्ध साक्ष्यों और लागू कानून के अनुसार किया जाए।
पत्रकारों को मानहानि, गोपनीयता, सूचना के अधिकार, समाचार स्रोतों और डिजिटल सामग्री से जुड़े कानूनी दायित्वों के बारे में प्रशिक्षण भी दिया जा सकता है। इससे जिम्मेदार पत्रकारिता को प्रोत्साहन मिलेगा और अनावश्यक विवादों की संभावना कम हो सकती है।
16. पत्रकारिता की स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी आवश्यक
पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग करते समय पत्रकारिता की स्वतंत्रता और जिम्मेदारी दोनों को ध्यान में रखना जरूरी है।
पत्रकार का दायित्व है कि वह समाचार प्रकाशित या प्रसारित करने से पहले तथ्यों की यथासंभव पुष्टि करे, संबंधित पक्ष का दृष्टिकोण लेने का प्रयास करे और अपुष्ट आरोपों को स्थापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत न करे।
इसी प्रकार किसी व्यक्ति, संस्था या सरकारी विभाग के विरुद्ध आरोप प्रकाशित होने पर संबंधित पक्ष को जवाब देने का उचित अवसर देना पत्रकारिता की विश्वसनीयता को मजबूत करता है।
राजेश कुमार सिद्धार्थ की ओर से उठाई गई सुरक्षा संबंधी मांगों पर विचार करते समय यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि प्रस्तावित कानून पत्रकारों की सुरक्षा करे, लेकिन किसी शिकायत की जांच या कानून के निष्पक्ष अनुपालन में अनुचित बाधा न बने।
यदि किसी पत्रकार के विरुद्ध शिकायत आती है, तो जांच कानून के अनुसार होनी चाहिए। यदि पत्रकार के विरुद्ध हिंसा या धमकी की शिकायत आती है, तो उस पर भी निष्पक्ष और समयबद्ध कार्रवाई होनी चाहिए।
इस प्रकार सुरक्षा, स्वतंत्रता, जिम्मेदारी और जवाबदेही के बीच संतुलन स्थापित करना प्रभावी पत्रकार सुरक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार हो सकता है।
17. संसद और राज्य विधानसभाओं में चर्चा कराने की मांग
अंतरराष्ट्रीय प्रेस परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेश कुमार सिद्धार्थ ने केंद्र सरकार से मांग की कि पत्रकार सुरक्षा कानून के विषय को गंभीरता से लिया जाए और आवश्यक होने पर संसद में व्यापक चर्चा के माध्यम से विधायी विकल्पों पर विचार किया जाए।
उन्होंने राज्य सरकारों से भी अपील की कि अपने-अपने राज्यों में पत्रकारों की सुरक्षा, कल्याण और आर्थिक स्थिति से संबंधित समस्याओं का अध्ययन किया जाए।
उनका कहना है कि देशभर में पत्रकारों की कार्य-स्थितियां एक जैसी नहीं हैं। किसी राज्य में ग्रामीण पत्रकारों की समस्याएं प्रमुख हो सकती हैं, जबकि किसी अन्य क्षेत्र में सुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं या नियमित मानदेय का प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है।
इसलिए पत्रकार संगठनों, मीडिया संस्थानों, कानूनी विशेषज्ञों, स्वतंत्र पत्रकारों, ग्रामीण संवाददाताओं और संबंधित विभागों के प्रतिनिधियों से सुझाव लेकर व्यापक नीति तैयार की जानी चाहिए।
उन्होंने मांग की कि सरकार पत्रकारों की सुरक्षा संबंधी शिकायतों के लिए प्रभावी तंत्र, सहायता की समयसीमा और जवाबदेही निर्धारित करे, ताकि प्रस्तावित व्यवस्था केवल कागजों तक सीमित न रहे।
18. पत्रकारों के लिए शिकायत निवारण तंत्र बनाया जाए
पत्रकार सुरक्षा कानून प्रभावी बनाने के लिए शिकायत दर्ज करने और उस पर कार्रवाई करने की प्रक्रिया स्पष्ट होनी चाहिए।
प्रस्तावित व्यवस्था के अंतर्गत पत्रकारों के लिए जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर शिकायत निवारण की उचित व्यवस्था विकसित करने पर विचार किया जा सकता है।
शिकायत मिलने पर संबंधित अधिकारी को मामले की प्रकृति, जोखिम और उपलब्ध साक्ष्यों का मूल्यांकन करना चाहिए। तत्काल खतरे की स्थिति में कानून के अनुसार आवश्यक सुरक्षा कदम उठाए जाने चाहिए।
पत्रकार को यह जानकारी भी उपलब्ध होनी चाहिए कि उसकी शिकायत किस अधिकारी के पास है, जांच की स्थिति क्या है और आगे की कार्रवाई के लिए कौन-सी प्रक्रिया अपनाई जाएगी।
राजेश कुमार सिद्धार्थ ने मांग की कि पत्रकारों की शिकायतों को अनावश्यक रूप से लंबित न रखा जाए। शिकायतों के निस्तारण की निगरानी, समयबद्ध कार्रवाई और संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए उचित व्यवस्था बनाई जाए।
19. पत्रकारों के बच्चों की शिक्षा और परिवार की सामाजिक सुरक्षा
पत्रकार की मृत्यु, गंभीर बीमारी या स्थायी दिव्यांगता की स्थिति में परिवार को केवल चिकित्सा या आर्थिक सहायता की जरूरत नहीं होती। बच्चों की शिक्षा और परिवार के दैनिक खर्च भी महत्वपूर्ण होते हैं।
राजेश कुमार सिद्धार्थ ने पत्रकार कल्याण नीति में पात्र आश्रित परिवारों की सामाजिक सुरक्षा से जुड़े उपायों पर विचार करने की मांग की।
इसके अंतर्गत गंभीर संकट से प्रभावित पत्रकार परिवारों के बच्चों के लिए शैक्षिक सहायता, छात्रवृत्ति, आवश्यक परामर्श और अन्य पात्र कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ने के विकल्पों पर विचार किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि सहायता की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि पत्रकार के परिवार को संकट के समय शिक्षा छोड़ने या आवश्यक उपचार टालने जैसी कठिन परिस्थितियों का सामना न करना पड़े।
इस दिशा में सरकारी योजनाओं और पत्रकार कल्याण कोष के बीच उचित समन्वय स्थापित करना भी उपयोगी हो सकता है।
20. पत्रकार सुरक्षा कानून बनाने से पहले व्यापक परामर्श हो
प्रभावी कानून बनाने के लिए उन लोगों की समस्याओं को समझना आवश्यक है, जिनके लिए कानून तैयार किया जा रहा है।
राजेश कुमार सिद्धार्थ ने मांग की कि पत्रकार सुरक्षा कानून के प्रारूप पर विचार करते समय पत्रकार संगठनों, छोटे समाचार पत्रों, क्षेत्रीय मीडिया संस्थानों, स्वतंत्र पत्रकारों, महिला पत्रकारों, ग्रामीण संवाददाताओं और कानूनी विशेषज्ञों से सुझाव लिए जाएं।
उन्होंने कहा कि कानून में पत्रकार की परिभाषा, पात्रता, सुरक्षा संबंधी अधिकार, शिकायत निवारण, चिकित्सा सहायता, बीमा, मानदेय और मृतक पत्रकार के परिवार को सहायता जैसे विषय स्पष्ट होने चाहिए।
साथ ही, फर्जी दावों को रोकने, निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने और नागरिकों के कानूनी अधिकारों की रक्षा करने के लिए भी उपयुक्त प्रावधान होने चाहिए।
कानून लागू होने के बाद उसके प्रभाव का नियमित मूल्यांकन किया जाना चाहिए, ताकि कमियों की पहचान कर आवश्यक सुधार किए जा सकें।
21. पत्रकारों के लिए न्यूनतम मानदेय नीति कैसे प्रभावी हो सकती है?
₹30,000 मासिक मानदेय की मांग को प्रभावी रूप देने के लिए यह स्पष्ट करना आवश्यक होगा कि इसका लाभ किन श्रेणियों के पत्रकारों को मिलेगा और भुगतान की जिम्मेदारी किसकी होगी।
नियमित वेतन पर कार्यरत पत्रकारों, अनुबंधित संवाददाताओं, स्वतंत्र पत्रकारों और छोटे मीडिया संस्थानों से जुड़े व्यक्तियों की कार्य-स्थितियां अलग-अलग हो सकती हैं।
इसलिए सरकार संबंधित पक्षों से विचार-विमर्श करके पात्रता और भुगतान की पारदर्शी व्यवस्था पर विचार कर सकती है। नीति बनाते समय कार्य की प्रकृति, काम के घंटे, अनुभव, अनुबंध और संस्थान के आकार जैसे विषयों का मूल्यांकन किया जा सकता है।
जहां आवश्यक हो, मीडिया संस्थानों की जिम्मेदारी और सरकारी सहायता की संभावनाओं के बीच स्पष्ट अंतर निर्धारित करना भी महत्वपूर्ण होगा।
राजेश कुमार सिद्धार्थ की मांग है कि आर्थिक सुरक्षा को पत्रकार कल्याण की प्राथमिकताओं में स्थान दिया जाए, ताकि पत्रकारों को नियमित और सम्मानजनक पारिश्रमिक उपलब्ध कराने की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकें।
22. एक करोड़ रुपये की सहायता और सरकारी नौकरी के लिए स्पष्ट नीति बने
पत्रकार की हत्या पर एक करोड़ रुपये की सहायता और पात्र आश्रित को सरकारी नौकरी देने की मांग को लागू करने के लिए एक सुव्यवस्थित नीति की आवश्यकता होगी।
इसमें पत्रकारिता संबंधी कार्य और हत्या के बीच संबंध की जांच, पात्र परिवार की पहचान, आवेदन की प्रक्रिया, आवश्यक दस्तावेज, सहायता स्वीकृत करने वाला प्राधिकरण और समयसीमा निर्धारित की जा सकती है।
सरकारी नौकरी से संबंधित प्रावधान बनाते समय लागू सेवा नियमों, पात्रता, शैक्षणिक योग्यता और पदों की उपलब्धता जैसे मुद्दों पर भी विधिसम्मत निर्णय लेना होगा।
राजेश कुमार सिद्धार्थ ने मांग की कि पात्र परिवार को सहायता उपलब्ध कराने की प्रक्रिया सरल हो और प्रशासनिक देरी से बचने के लिए समयबद्ध व्यवस्था स्थापित की जाए।
उन्होंने यह भी कहा कि सहायता राशि और नौकरी के अतिरिक्त मृतक पत्रकार के परिवार को चिकित्सा, शिक्षा और अन्य आवश्यक सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से जोड़ने पर विचार होना चाहिए।
23. पत्रकार सुरक्षा केवल पत्रकारों का नहीं, जनता का भी सवाल
पत्रकारों की सुरक्षा का संबंध जनता के सूचना पाने के अधिकार और लोकतांत्रिक व्यवस्था की जवाबदेही से भी है।
जब किसी क्षेत्र में सरकारी योजना का लाभ पात्र व्यक्ति तक नहीं पहुंचता, किसी विद्यालय में सुविधाओं की कमी होती है, अस्पताल में समस्याएं सामने आती हैं या सार्वजनिक धन के उपयोग को लेकर शिकायतें उठती हैं, तो पत्रकार इन विषयों को जनता के सामने लाने में भूमिका निभाते हैं।
यदि पत्रकारों को भय या अनुचित दबाव के कारण जनहित के विषयों पर रिपोर्टिंग करने में कठिनाई होती है, तो नागरिकों तक महत्वपूर्ण जानकारी पहुंचने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
इसीलिए पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग को व्यापक सार्वजनिक हित के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। ऐसी व्यवस्था पत्रकारों की स्वतंत्रता और सुरक्षा को मजबूत करने के साथ-साथ तथ्यपरकता, जवाबदेही और कानून के समान अनुपालन को भी सुनिश्चित करे।
राजेश कुमार सिद्धार्थ ने कहा कि पत्रकारों की सुरक्षा, सम्मान और आर्थिक स्थिरता को मजबूत करना लोकतांत्रिक व्यवस्था के हित में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
24. केंद्र सरकार से प्रमुख मांगों पर शीघ्र निर्णय की अपील
अंतरराष्ट्रीय प्रेस परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेश कुमार सिद्धार्थ ने केंद्र सरकार से पत्रकार सुरक्षा और कल्याण से संबंधित मांगों पर गंभीरता से विचार करने की अपील की।
उन्होंने निम्न प्रमुख मांगों को सामने रखा:
1. देशभर में पत्रकारों के लिए प्रभावी पत्रकार सुरक्षा कानून बनाने की दिशा में शीघ्र पहल की जाए।2. पात्र पत्रकारों के लिए न्यूनतम ₹30,000 मासिक मानदेय सुनिश्चित करने की नीति बनाई जाए।3. पत्रकार की हत्या उसके पत्रकारिता संबंधी कार्य के कारण होने की पुष्टि पर पात्र परिवार को एक करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता देने का प्रावधान हो।4. मृतक पत्रकार के पात्र आश्रित परिवार के एक सदस्य को तत्काल सरकारी नौकरी देने की व्यवस्था पर विचार किया जाए।5. पत्रकारों और उनके पात्र आश्रित परिवारों के लिए निःशुल्क चिकित्सा और स्वास्थ्य बीमा की प्रभावी व्यवस्था बनाई जाए।6. जीवन बीमा और दुर्घटना बीमा उपलब्ध कराने के लिए उचित नीति तैयार की जाए।7. पत्रकारों पर हमले, धमकी और रिपोर्टिंग में बाधा डालने की घटनाओं पर त्वरित तथा निष्पक्ष कार्रवाई हो।8. कथित झूठे और दुर्भावनापूर्ण मुकदमों की निष्पक्ष जांच तथा कानूनी सहायता की व्यवस्था हो।9. राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर पत्रकार कल्याण कोष स्थापित करने की संभावनाओं पर विचार किया जाए।10. ग्रामीण पत्रकारों, स्वतंत्र संवाददाताओं और छोटे मीडिया संस्थानों से जुड़े पात्र पत्रकारों को सुरक्षा और कल्याण संबंधी योजनाओं में उचित स्थान दिया जाए।11. समाचार स्रोतों की गोपनीयता और पत्रकारों की कार्य स्वतंत्रता के लिए उचित कानूनी संरक्षण पर विचार किया जाए।12. पत्रकारों के बच्चों की शिक्षा और संकटग्रस्त परिवारों की सामाजिक सुरक्षा के लिए सहायता योजनाएं विकसित की जाएं।13. पत्रकार सुरक्षा कानून के प्रारूप पर पत्रकार संगठनों, मीडिया संस्थानों और कानूनी विशेषज्ञों से परामर्श लिया जाए।14. पत्रकारों की शिकायतों के लिए समयबद्ध और जवाबदेह शिकायत निवारण तंत्र स्थापित किया जाए।15. कानून और योजनाओं के क्रियान्वयन की नियमित समीक्षा की व्यवस्था बनाई जाए।
25. सच्चाई की आवाज को सुरक्षा मिलना जरूरी
पत्रकारिता समाज को सूचना देने, सार्वजनिक समस्याओं को सामने लाने और शासन-प्रशासन की जवाबदेही सुनिश्चित करने का महत्वपूर्ण माध्यम है। पत्रकारों को अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते समय सुरक्षा, सम्मान और न्याय मिलना चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय प्रेस परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेश कुमार सिद्धार्थ ने केंद्र सरकार से मांग की है कि पत्रकार सुरक्षा कानून को लेकर व्यापक चर्चा और आवश्यक विधायी प्रक्रिया शुरू की जाए। उन्होंने विशेष रूप से पत्रकार की हत्या पर एक करोड़ रुपये मुआवजा, पात्र आश्रित को सरकारी नौकरी, परिवार को निःशुल्क चिकित्सा और पत्रकारों के लिए न्यूनतम ₹30,000 मासिक मानदेय की मांग को प्रमुखता से उठाया।
उनका कहना है कि पत्रकारों के हितों की रक्षा के लिए ऐसी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए, जो केवल संकट आने पर सहायता देने तक सीमित न रहे, बल्कि पत्रकारों और उनके परिवारों को दीर्घकालीन सुरक्षा भी प्रदान करे।
पत्रकार सुरक्षा कानून, आर्थिक सहायता, बीमा, स्वास्थ्य सेवाएं और कल्याण कोष जैसी मांगों पर निर्णय लेते समय पात्रता, पारदर्शिता, जवाबदेही और निष्पक्ष जांच के मानदंड निर्धारित करना आवश्यक होगा।
अब पत्रकार संगठनों और मीडिया प्रतिनिधियों की अपेक्षा है कि केंद्र सरकार तथा राज्य सरकारें इन मांगों पर विचार-विमर्श कर व्यवहारिक और प्रभावी नीति बनाने की दिशा में कदम उठाएं।
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पत्रकार सुरक्षा कानून के लिए एकजुट आवाज उठाने की अपील
अंतरराष्ट्रीय प्रेस परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेश कुमार सिद्धार्थ ने पत्रकारों, पत्रकार संगठनों और मीडिया संस्थानों से अपील की कि वे पत्रकारों की सुरक्षा, सम्मान, आर्थिक स्थिरता और परिवारों के कल्याण से जुड़े मुद्दों पर शांतिपूर्ण, लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से अपनी मांगें रखें।
उन्होंने कहा कि पत्रकारों के अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुटता, तथ्यपरक संवाद और सरकार के साथ रचनात्मक विचार-विमर्श महत्वपूर्ण है। पत्रकारिता की स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी निभाते हुए पत्रकारों के लिए सुरक्षित कार्य वातावरण विकसित किया जाना चाहिए।
प्रमुख नारा
पत्रकार सुरक्षा कानून लागू करो!
पत्रकारों पर हमले और धमकियां बंद करो!
पत्रकार की हत्या पर एक करोड़ रुपये मुआवजे का प्रावधान करो!
मृतक पत्रकार के पात्र आश्रित को सरकारी नौकरी दो!
पत्रकारों और उनके परिवारों को निःशुल्क इलाज दो!
पात्र पत्रकारों को न्यूनतम ₹30,000 मासिक मानदेय देने की नीति बनाओ!
पत्रकारों के लिए जीवन बीमा, स्वास्थ्य बीमा और कल्याण कोष स्थापित करो!
सच्चाई की सुरक्षा ही लोकतंत्र की मजबूती है!
नोट: इस समाचार में उल्लिखित एक करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता, सरकारी नौकरी, न्यूनतम ₹30,000 मासिक मानदेय, निःशुल्क चिकित्सा, बीमा और अन्य व्यवस्थाएं मांगों एवं प्रस्तावों के रूप में प्रस्तुत हैं। इन्हें सरकार द्वारा स्वीकृत निर्णय या वर्तमान में लागू सार्वभौमिक कानूनी अधिकार न माना जाए। पत्रकार की हत्या और उसके पत्रकारिता संबंधी कार्य के बीच संबंध, सहायता की पात्रता तथा अन्य मामलों का निर्धारण लागू कानून और संबंधित जांच के अनुसार होगा।