- *रोस्टर के उस पार: जब न्याय को अपने ही आईने में देखना पड़े*
*रोस्टर आखिर बना किसलिए है?*Supreme Court का roster महज प्रशासनिक कागज नहीं है। वह यह तय करने की institutional व्यवस्था है कि किस प्रकृति के मामले किस Bench के सामने जाएँगे।13 जुलाई 2026 से प्रभावी roster में Habeas Corpus और Preventive Detention—Category 2201–2202 कुछ निर्धारित Benches को आवंटित थी।
उस सूची में Justice B.V. Nagarathna की Bench थी।Justice Satish Chandra Sharma की ordinary roster allocation में यह category नहीं थी।यह कोई व्याख्या नहीं।यह स्वयं Supreme Court के roster का दस्तावेज़ है।फिर 23 सितंबर को Medha Roopam से संबंधित मामला Justice S.C. Sharma और Justice N. Kotiswar Singh की Bench के सामने पहुँचता है।बस।यहीं से सवाल पैदा होता है।और लोकतंत्र में सवाल पैदा होना अपराध नहीं होता।सवाल का उत्तर न मिलना चिंता का विषय हो सकता है।
*“Specially Assigned” — यही वह छोटा-सा वाक्य है जिसमें बड़ा प्रश्न छिपा है*Justice Sharma के roster में एक प्रावधान है—“ANY OTHER MATTER SPECIALLY ASSIGNED.”बिल्कुल संभव है कि इसी administrative provision के तहत कोई विशेष assignment हुआ हो।यदि ऐसा हुआ है तो समस्या नहीं—स्पष्टीकरण चाहिए।किसने assign किया?कब किया?किस administrative authority के तहत किया?किस कारण से किया?और क्या connected proceedings की judicial history उस निर्णय के समय सामने थी?इन सवालों के उत्तर किसी आरोप का प्रमाण नहीं होंगे।बल्कि वे आरोपों की आवश्यकता ही समाप्त कर सकते हैं।
*पारदर्शिता का यही तो सौंदर्य है—वह संदेह को प्रमाण में और प्रमाण के अभाव को स्पष्टता में बदल देती है।*क्योंकि यह कोई बिल्कुल अकेला मामला नहीं थाइस पूरे घटनाक्रम से जुड़े preventive-detention matters पहले Justice B.V. Nagarathna की Bench के सामने आ चुके थे।
*इसलिए स्वाभाविक प्रश्न है*—जब एक ही factual controversy से जुड़े मामले पहले से एक Bench के सामने judicial consideration में थे, तब बाद का संबंधित matter दूसरी Bench तक किस प्रक्रिया से पहुँचा?यहाँ किसी न्यायाधीश की नीयत पर प्रश्न उठाना आवश्यक नहीं।प्रक्रिया पर प्रश्न पर्याप्त है।और कभी-कभी प्रक्रिया से पूछा गया प्रश्न व्यक्ति से पूछे गए आरोप से कहीं अधिक ताकतवर होता है।क्योंकि व्यक्ति अपने बचाव में बहुत कुछ कह सकता है।दस्तावेज़ केवल एक बात कहते हैं—जो वास्तव में हुआ है।
*फिर आया 23 सितंबर का आदेश*Supreme Court ने Medha Roopam की challenge पर interim protection दी।लेकिन अगले दिन order revise हुआ।इस संशोधन के बाद स्पष्ट किया गया कि stay Allahabad High Court के उन हिस्सों पर है जिनमें strictures और ₹5 लाख compensation/recovery की directions थीं।Akriti Chaudhary की detention quash करने वाला substantive High Court decision उसी तरह stayed नहीं हुआ।
*यह अंतर छोटा नहीं है।*क्योंकि न्यायिक विमर्श में आधे सच की चमक अक्सर पूरे तथ्य की रोशनी को ढँक देती है।इसलिए पूरे तथ्य को पूरा ही रहने देना चाहिए।
*और फिर सामने आया रिश्तों का प्रश्न*Medha Roopam, Chief Election Commissioner Gyanesh Kumar की daughter हैं।दूसरी ओर, सार्वजनिक रिपोर्टिंग के अनुसार Justice S.C. Sharma के पुत्र Election Commission of India के standing counsel हैं।इन तथ्यों को छिपाने की आवश्यकता नहीं।लेकिन इन्हें जोड़कर किसी व्यक्ति की नीयत पर फैसला सुनाना भी उचित नहीं।रिश्ता अपने आप में दोष नहीं होता।लेकिन न्यायिक संस्थाओं की मर्यादा इतनी ऊँची होती है कि वहाँ केवल वास्तविक निष्पक्षता ही नहीं, निष्पक्षता की सार्वजनिक धारणा भी महत्वपूर्ण हो जाती है।यही कारण है कि judicial propriety का प्रश्न केवल तब नहीं उठता जब कोई पक्षपात सिद्ध हो जाए।कभी-कभी प्रश्न यह भी होता है—
*«क्या परिस्थितियाँ ऐसी थीं कि संस्था को स्वयं आगे बढ़कर संदेह दूर करना चाहिए था?»*न्यायपालिका से सवाल करना न्यायपालिका का अपमान नहींयह भ्रम जितनी जल्दी समाप्त हो, उतना अच्छा।लोकतंत्र में संसद पर प्रश्न करना संसद-विरोध नहीं।सरकार पर प्रश्न करना राष्ट्र-विरोध नहीं।और न्यायपालिका से प्रश्न करना न्यायपालिका-विरोध नहीं।संस्थाएँ प्रश्नों से मजबूत होती हैं—प्रश्नों से भागने से नहीं।
न्यायपालिका की प्रतिष्ठा इतनी नाजुक नहीं होनी चाहिए कि एक roster पर सवाल पूछना ही उसे चोट पहुँचा दे।बल्कि प्रतिष्ठा इतनी मजबूत होनी चाहिए कि वह कह सके—देखिये।यह रहा roster।यह रही listing history।यह रहा assignment order।यह रहा कारण।फिर जनता स्वयं देख लेगी कि सवाल में वजन था या केवल शोर।
*असली लड़ाई किसी व्यक्ति से नहीं, अपारदर्शिता से है*इस प्रकरण को व्यक्तियों के विरुद्ध अभियान में बदल देना आसान है।लेकिन वह सबसे आसान रास्ता होगा।कठिन रास्ता है संस्था से कहना—हमें किसी को दोषी नहीं बनाना।हमें केवल प्रक्रिया समझनी है।अगर सब कुछ नियम के अनुसार हुआ है, तो सार्वजनिक रिकॉर्ड उस नियमसम्मत प्रक्रिया की पुष्टि करेगा।अगर कोई विशेष assignment हुआ था, तो उसका administrative basis सामने आ सकता है।
अगर listing सामान्य प्रक्रिया से हुई थी, तो वह भी स्पष्ट किया जा सकता है।फिर प्रश्न समाप्त।इतना ही तो चाहिए।
क्योंकि Rule of Law का अर्थ केवल “कानून लागू हुआ” नहीं हैRule of Law का अर्थ यह भी है कि—कानून सबके लिए समान हो,प्रक्रिया पूर्वानुमेय हो,संस्थागत शक्तियों का प्रयोग पारदर्शी हो,और न्याय पाने वाला नागरिक यह महसूस कर सके कि उसके सामने बैठी संस्था किसी अदृश्य प्रभाव से संचालित नहीं हो रही।
*न्याय की कुर्सी जितनी ऊँची होती है,*उस पर बैठी प्रक्रिया उतनी ही पारदर्शी होनी चाहिए।वरना कानून की किताब हाथ में रह जाती है और विश्वास धीरे-धीरे हाथ से निकल जाता है।
इसलिए आज किसी पर आरोप लगाने से पहले केवल इतना ही पूछना है —रोस्टर क्या कहता था?मामला वहाँ कैसे पहुँचा?यदि विशेष assignment था तो आदेश कहाँ है?यदि connected proceedings किसी दूसरी Bench के सामने थे तो administrative reasoning क्या थी?और यदि हर कदम नियम के अनुसार था तो उसे बताने में संकोच कैसा?इन प्रश्नों में किसी के विरुद्ध फैसला नहीं छिपा है।इन प्रश्नों में केवल जवाबदेही की माँग है।और शायद यही लोकतंत्र की सबसे सुंदर बात है—जनता न्यायालय के फैसले पर बहस कर सकती है,न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल उठा सकती है,और संस्था से पारदर्शिता मांग सकती है।क्योंकि न्यायपालिका जनता के विश्वास से बड़ी नहीं होती।वह उसी विश्वास की संरक्षक होती है।
*अंत में केवल एक बात*न्याय की सबसे बड़ी ताकत उसकी तलवार नहीं होती।उसकी धार पर जनता का विश्वास होता है।इसलिए उस धार को कुंद करने वाला सबसे बड़ा खतरा कोई आलोचना नहीं—अपारदर्शिता है।और पारदर्शिता की मांग को दबाने के बजाय यदि संस्था स्वयं आगे आकर कह दे—«“यह रहा पूरा रिकॉर्ड। अब आप स्वयं तय कीजिए।”»
तो शायद इससे अधिक शक्तिशाली उत्तर Rule of Law के पास हो ही नहीं सकता।
क्योंकि जिस न्याय को अपने ऊपर उठे सवालों से डर नहीं लगता,वही न्याय वास्तव में अपने सिंहासन पर निर्विवाद बैठता है।
*गौतम राणे सागर* राष्ट्रीय संयोजक संविधान संरक्षण मंच।