- *इस्तीफों की खामोश गवाही और लोकतंत्र की संस्थाएँ*
लोकतंत्र केवल चुनाव कराने का नाम नहीं है। लोकतंत्र की असली शक्ति उन संस्थाओं में होती है जो सत्ता से प्रश्न पूछने, सत्ता को सीमित करने और कानून को सत्ता से ऊपर रखने का साहस रखती हैं। सत्ता के समक्ष बग़ैर रीढ़ की हड्डी जैसे साष्टांग मुद्रा में सज्ज रहना संस्था का अनादर है। संस्था ने जिन्हें असीमित शक्तियां दी है और उनके व्यक्तित्व को गरिमामय बनाया है यदि कार्यपालिका उस संस्था की गरिमा नही बढ़ा सकती है तो उसे तुच्छ साबित करने का दुस्साहस न करें ।
इसीलिए किसी संवैधानिक या वैधानिक संस्था के भीतर होने वाला एक इस्तीफा केवल एक कर्मचारी के जाने की घटना नहीं होता। कभी-कभी वह एक व्यक्तिगत निर्णय होता है, कभी प्रशासनिक परिस्थितियों का परिणाम, और कभी वह उस असहजता की सार्वजनिक अभिव्यक्ति बन जाता है जो किसी संस्था के भीतर पैदा हो रही हो।
*लेकिन इतिहास का न्याय भी सावधानी मांगता है।*
अरुण गोयल, अशोक लवासा, उर्जित पटेल, वायरल आचार्य और आलोक वर्मा जैसे अलग-अलग संस्थानों से जुड़े प्रसंगों को एक ही कारण से जोड़ देना दस्तावेजी रूप से सही नहीं होगा। फिर भी इन घटनाओं में एक साझा प्रश्न बार-बार सामने आता है—
क्या भारत की संवैधानिक और नियामक संस्थाएँ इतनी स्वतंत्र हैं कि उनके अधिकारी सत्ता के सामने असहमति दर्ज कर सकें और संस्था के भीतर वह असहमति सुरक्षित रह सके? संविधान के प्रति निष्ठा प्रस्तुत करने के बरअक्स कहीं कोई व्यक्ति स्वांतः सुखाय को प्राथमिकता तो नही दे रहा है?
यही प्रश्न आज चुनाव आयोग के संदर्भ में और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
*₹2,000 का नोट भी एक संस्थागत कहानी है*
8 नवंबर 2016 को भारतीय रिजर्व बैंक ने ₹2,000 के नए नोट जारी करने की घोषणा की। RBI के आधिकारिक दस्तावेज में स्पष्ट है कि नोट पर तत्कालीन RBI Governor डॉ. उर्जित आर. पटेल के हस्ताक्षर थे और पीछे मुद्रण वर्ष 2016 अंकित था।
यहाँ एक महत्वपूर्ण तथ्यात्मक सावधानी जरूरी है।
₹2,000 के नोट की छपाई कब शुरू हुई—इसका सटीक प्रारंभिक दिन उपलब्ध RBI दस्तावेज से स्थापित नहीं होता। इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि “उर्जित पटेल के Governor बनने से पहले ही ₹2,000 के नोट छप चुके थे”। इतना जरूर स्थापित है कि ₹2,000 नोट 2016 में जारी हुआ और उस पर उर्जित पटेल के हस्ताक्षर थे। इस बिन्दु को नज़रंदाज नही किया जा सकता है कि ₹2,000 के नोट 8 नवंबर 2016 से पहले ही छप चुके होंगे?
RBI के अनुसार ₹2,000 के नोटों की छपाई बाद में 2018-19 में बंद कर दी गई। इतना अदूरदर्शी निर्णय वह भी दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री द्वारा लिया जाना उचित तो नही कहा जा सकता है।
*इस मुद्रा की कहानी से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है उस दौर में RBI की स्वायत्तता का प्रश्न।*
उर्जित पटेल और विरल आचार्य: जब केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता स्वयं बहस का विषय बनी
दिसंबर 2018 में उर्जित पटेल ने RBI Governor पद से इस्तीफा दिया। उनके इस्तीफे में आधिकारिक कारण “personal reasons” बताया गया था। उन्होंने RBI के अधिकारियों और अपने सहयोगियों को धन्यवाद भी दिया। नौकरीपेशा और पेशेवर लोग प्रायः विवाद से पृथक रहने का प्रयास करते हैं। फलतः यथार्थ को गुप्त रखने में माहिर लोग सुगम पथ पर चलते रहने को प्राथमिकता देते हैं ।
लेकिन उनके इस्तीफे से पहले RBI और केंद्र सरकार के बीच कई आर्थिक और संस्थागत मुद्दों पर सार्वजनिक मतभेद सामने आ चुके थे।
और फिर सामने आया विरल आचार्य का वह भाषण, जो भारत में केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता पर सबसे स्पष्ट सार्वजनिक हस्तक्षेपों में गिना जाता है।
26 अक्टूबर 2018 को RBI के तत्कालीन Deputy Governor विरल वी. आचार्य ने स्वतंत्र नियामक संस्थाओं के महत्व पर अपना A.D. Shroff Memorial Lecture दिया। RBI की अपनी वेबसाइट पर उपलब्ध भाषण का शीर्षक ही था—
“On the Importance of Independent Regulatory Institutions – The Case of the Central Bank.”
यानी प्रश्न केवल इतना नहीं था कि कौन अधिकारी कब गया।
प्रश्न यह था कि संस्था कितनी स्वतंत्र रह सकती है?
और यही वह बिंदु है जहाँ इस्तीफे व्यक्तिगत घटनाएँ न रहकर संस्थागत विमर्श का हिस्सा बन जाते हैं। देश की संप्रभुता, संस्थाओं की स्वायत्तता, निरंकुश सत्ता का सहयोगी न बनना काबिले तारीफ कदम है परन्तु देश को आर्थिक पतनोन्मुख की साज़िश का देश के समक्ष खुलासा करने के आत्मबल प्रदर्शन भी आवश्यक अंग है जिसे विरल के प्रबोधन ने सतर्क होने की चेतावनी दी।
अशोक लवासा: चुनाव आयोग में असहमति की आवाज
2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान Election Commissioner अशोक लवासा ने कुछ Model Code of Conduct मामलों में आयोग के बहुमत के निर्णयों से अलग मत व्यक्त किया।
मई 2019 में उन्होंने यह प्रश्न उठाया कि यदि किसी संवैधानिक बहुसदस्यीय संस्था में minority view है, तो उसे अंतिम आदेश में दर्ज क्यों न किया जाए।
उन्होंने स्पष्ट प्रश्न रखा था—
यदि निर्णय बहुमत से होता है और minority view को अंतिम आदेश में शामिल ही नहीं किया जाता, तो minority view का महत्व क्या रह जाता है?
यह केवल एक व्यक्ति की नाराज़गी नहीं थी। यह बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था में असहमति के अधिकार और उसकी संस्थागत दृश्यता का प्रश्न था। इस टिप्पणी ने कई जाँच एजेंसी को लवासा के घर का मार्ग दिखा दिया । उस त्रासदी से उनकी पत्नी किस तरह से उबरी होंगी मर्म को उनसे बेहतर कोई बयान नही कर सकता!
लवासा बाद में 2020 में चुनाव आयोग से चले गए और Asian Development Bank में Vice-President बने।
यहाँ भी तथ्य यही है कि उनके जाने का घोषित अगला पेशेवर पड़ाव ADB था। इसे स्वतः “सरकार के दबाव में इस्तीफा” कहना दस्तावेजी रूप से उचित नहीं होगा?
लेकिन उनके दर्ज किए गए dissent को इतिहास से मिटाया भी नहीं जा सकता।
*और फिर आया आलोक वर्मा प्रकरण*
यदि किसी एक घटना को भारत में संस्थागत अधिकार बनाम कार्यपालिका की शक्ति की बहस के लिए उदाहरण बनाया जाए, तो CBI Director आलोक कुमार वर्मा का मामला अत्यंत महत्वपूर्ण है।
23 अक्टूबर 2018 को Central Vigilance Commission ने आलोक वर्मा को CBI Director के रूप में प्राप्त शक्तियों, कार्यों, कर्तव्यों और supervisory role से वंचित कर दिया। प्रश्न यही है कि क्या सीवीसी निदेशक को सीबीआई के स्थापना का अधिकार प्राप्त है?
इसके बाद उसी दिन Department of Personnel and Training ने भी उन्हें CBI Director के रूप में उनकी शक्तियों और कार्यों से अलग करने का आदेश जारी किया।
लेकिन यहाँ वह कानूनी बिंदु आता है जिसे अक्सर राजनीतिक बयानबाजी में खो दिया जाता है।
सर्वोच्च न्यायालय ने क्या कहा?
8 जनवरी 2019 को Supreme Court ने Alok Kumar Verma v. Union of India मामले में CVC और DoPT के 23 अक्टूबर के आदेशों को रद्द कर दिया। सर्वोच्च न्यायालय के 8 जनवरी के निर्णय से पहले दिये गये तारीख़ों और टिप्पणियों को नजरअंदाज करके सर्वोच्चता के मापदंड के विश्लेषण को उचित कहना न्याय संगत है?
न्यायालय ने शुरुआत ही इस सिद्धांत से की कि—
Rule of law is the bedrock of democracy.
और न्यायालय के सामने मूल कानूनी प्रश्न यह था कि क्या CVC और सरकार CBI Director को उसकी शक्तियों से इस प्रकार अलग कर सकते हैं, जबकि CBI Director की नियुक्ति के लिए बनी statutory Selection Committee की पूर्व सहमति प्राप्त नहीं की गई थी।
न्यायालय ने उन आदेशों को इसलिए हटाया और मामला Section 4A(1) के अंतर्गत गठित समिति के समक्ष भेजने का निर्देश दिया।
लेकिन Supreme Court ने एक और महत्वपूर्ण संतुलन बनाया।
आलोक वर्मा को तत्काल पूर्ण प्रशासनिक स्वतंत्रता देकर मामला समाप्त नहीं किया गया। न्यायालय ने कहा कि पुनर्स्थापना के बाद वे केवल routine functions करें और Selection Committee के निर्णय तक कोई major policy या institutional decision न लें। भारत एक भावना प्रधान देश है इस आदेश के वास्तविक मायने निकालने के लिए स्मरण रखना होगा कि जो संस्था सीबीआई की स्थापना के लिए अधिकृत नही थी उसके आदेश को आलोक वर्मा को स्वीकार करने के मजबूर क्यों होना पड़ा? विशेष स्मरणीय बिंदु है कि राफेल घोटाले मामले की प्राथमिकी दर्ज करने हेतु प्रत्यावेदन सीबीआई की टेबल पर पड़ा था।
यानी न्यायालय का संदेश स्पष्ट था:
कार्यपालिका की शक्ति असीमित नहीं है; लेकिन वैधानिक चयन समिति की भूमिका भी समाप्त नहीं की जा सकती या इतर?
और फिर वही तीन-सदस्यीय समिति
इसके बाद मामला उस समिति के पास गया जिसकी संरचना अत्यंत महत्वपूर्ण थी—
- प्रधानमंत्री- लोकसभा में विपक्ष के नेता- Chief Justice of India अथवा उनके द्वारा नामित Supreme Court Judge
CJI Ranjan Gogoi recused himself and nominated Justice A. K. Sikri.
यह तथ्य इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि न्यायपालिका ने स्वयं अपने judicial role और subsequent administrative/selection role के बीच दूरी बनाए रखने का प्रयास किया था। प्रथमदृष्टया यही प्रतीत होता है।
और फिर समिति ने आलोक वर्मा के भविष्य पर निर्णय लिया।
इस पूरी घटना में सबसे महत्वपूर्ण बात किसी एक व्यक्ति की जीत या हार नहीं है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि एक Director की शक्तियाँ हटाने के प्रश्न को अंततः वैधानिक प्रक्रिया के सामने लाया गया।
*यही लोकतांत्रिक संस्थाओं की असली परीक्षा है।*
अरुण गोयल का अचानक जाना
मार्च 2024 में Election Commissioner अरुण गोयल ने इस्तीफा दे दिया, जबकि उनका कार्यकाल दिसंबर 2027 तक था।
उनका इस्तीफा स्वीकार होने के बाद चुनाव आयोग तीन में से केवल एक सदस्य—CEC राजीव कुमार—तक सिमट गया। उस समय इस्तीफे का कारण सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं किया गया था।
इस घटना ने स्वाभाविक रूप से सवाल पैदा किए।
लेकिन पत्रकारिता और इतिहास दोनों की जिम्मेदारी है कि सवाल और निष्कर्ष के बीच की दूरी बनाए रखें।
अज्ञात कारण को राजनीतिक कारण घोषित करना उतना ही गलत है जितना घटना को महत्वहीन मान लेना।
अरुण गोयल का इस्तीफा इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि वह आम चुनाव की घोषणा से ठीक पहले हुआ और चुनाव आयोग की संरचना पर तत्काल प्रभाव पड़ा।
फिर बदल गया चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का ढांचा
यहीं से कहानी वर्तमान तक पहुँचती है।
2023 का Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Act नियुक्ति की नई व्यवस्था लेकर आया।
नई Selection Committee में शामिल हैं—
प्रधानमंत्री + लोकसभा में विपक्ष के नेता + प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री।
यह व्यवस्था उस Supreme Court व्यवस्था से अलग है जिसमें Chief Justice of India भी Selection Committee का सदस्य था।
यही वह संवैधानिक प्रश्न है जिस पर बहस होनी चाहिए।
प्रश्न यह नहीं कि “कौन हमारा आदमी है?”
प्रश्न यह है—
जिस संस्था को चुनाव की निष्पक्षता की निगरानी करनी है, उसके शीर्ष अधिकारियों की नियुक्ति की प्रक्रिया में संस्थागत संतुलन कितना होना चाहिए?
यह प्रश्न किसी एक पार्टी का नहीं है।
यह प्रश्न सत्ता में आज कौन है, उससे बड़ा है।
क्योंकि सत्ता बदलती है।
संस्थाएँ रह जाती हैं।
ज्ञानेश कुमार: व्यक्ति से बड़ा है पद
ज्ञानेश कुमार ने 19 फरवरी 2025 को भारत के 26वें Chief Election Commissioner के रूप में पदभार ग्रहण किया। Election Commission की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार वे 1988 बैच के Kerala-cadre IAS अधिकारी रहे हैं और केंद्र सरकार में गृह मंत्रालय, संसदीय कार्य मंत्रालय तथा सहकारिता मंत्रालय सहित विभिन्न पदों पर कार्य कर चुके हैं।
उनकी नियुक्ति 2023 के नए कानून के अंतर्गत हुई।
नियुक्ति समिति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और विपक्ष के नेता राहुल गांधी शामिल थे। राहुल गांधी ने नियुक्ति प्रक्रिया पर आपत्ति दर्ज करते हुए Supreme Court में लंबित चुनौती के परिणाम की प्रतीक्षा करने की मांग की थी।
यहाँ फिर वही सावधानी आवश्यक है।
किसी अधिकारी की पिछली सरकारी सेवा अपने-आप में उसकी चुनावी निष्पक्षता का प्रमाण या उसके विरुद्ध प्रमाण नहीं है।
उसका वास्तविक मूल्यांकन उसके निर्णयों, प्रक्रियाओं, पारदर्शिता और संस्था के भीतर असहमति के प्रति उसके व्यवहार से होना चाहिए।
और आज यही कसौटी सबसे महत्वपूर्ण बन चुकी है।
2026: असहमति फिर चुनाव आयोग के भीतर
सितंबर 2026 में Indian Express की एक जांच ने चुनाव आयोग के भीतर दो Election Commissioners—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—द्वारा SIR और Form 6 से संबंधित प्रक्रियाओं पर उठाई गई आपत्तियों की रिपोर्ट की।
रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने Form 6 में SIR से संबंधित नए declaration को “illegal” और “unauthorised” बताते हुए सवाल उठाए।
दूसरी रिपोर्ट में आयोग के भीतर IT systems, electoral-roll control और decision-making के केंद्रीकरण से जुड़े प्रश्नों को सामने रखा गया।
लेकिन यहाँ आयोग का अपना उत्तर भी दर्ज होना चाहिए।
Election Commission ने कहा कि उसके सभी निर्णय पिछले एक वर्ष में full Commission के unanimous decisions रहे हैं और आंतरिक मतभेद deliberative process का सामान्य हिस्सा हैं।
यानी वर्तमान स्थिति में दो बातें साथ-साथ दस्तावेज में मौजूद हैं—
एक ओर दो Election Commissioners की दर्ज आपत्तियाँ; दूसरी ओर CEC के नेतृत्व वाले आयोग का यह आधिकारिक पक्ष कि अंतिम निर्णय unanimous रहे हैं।
यही लोकतंत्र है—दावे भी रिकॉर्ड में रहें और प्रतिदावे भी।
असली सवाल: संस्था किसके प्रति जवाबदेह है?
आज प्रश्न ज्ञानेश कुमार व्यक्तिगत रूप से क्या “लाभ” प्राप्त कर रहे हैं—यह नहीं पूछा जा सकता जब तक उसके लिए ठोस प्रमाण न हो।
और न ही यह कहा जा सकता है कि उनके प्रत्येक निर्णय के पीछे सरकार का कोई छिपा हुआ उद्देश्य है।
लेकिन एक बड़ा और अधिक गंभीर प्रश्न जरूर पूछा जा सकता है:
क्या वर्तमान संस्थागत ढांचा ऐसा है जिसमें चुनाव आयोग कार्यपालिका से पर्याप्त दूरी बनाए रखते हुए काम कर सके?
दूसरा प्रश्न:
क्या Election Commissioners को अपनी असहमति सार्वजनिक या आधिकारिक रिकॉर्ड में सुरक्षित रखने की पर्याप्त संस्थागत जगह है?
तीसरा:
क्या मतदाता सूची जैसी लोकतंत्र की बुनियादी प्रक्रिया में अंतिम निर्णय के लिए पर्याप्त पारदर्शी, विकेन्द्रीकृत और audit-able व्यवस्था मौजूद है?
और चौथा:
क्या नियुक्ति की प्रक्रिया ऐसी है कि सत्ता में बैठी सरकार और संवैधानिक संस्था के बीच आवश्यक संस्थागत दूरी बनी रहे?
इन प्रश्नों का उत्तर किसी एक व्यक्ति को दोषी ठहराकर नहीं मिलेगा।
इनका उत्तर कानून, प्रक्रिया और संस्थागत व्यवहार के परीक्षण से मिलेगा।
इस्तीफे हमेशा विद्रोह नहीं होते—लेकिन असहमति हमेशा इतिहास का दस्तावेज होती है
उर्जित पटेल ने अपने इस्तीफे में personal reasons कहा।
अरुण गोयल के इस्तीफे का तत्काल कारण सार्वजनिक नहीं हुआ।
अशोक लवासा ने संस्थागत dissent को रिकॉर्ड कराने का सवाल उठाया।
विरल आचार्य ने independent regulatory institutions के महत्व पर सार्वजनिक भाषण दिया।
आलोक वर्मा मामले में Supreme Court ने executive action की वैधानिक सीमा पर हस्तक्षेप किया।
इन सबको एक ही रंग से रंग देना इतिहास के साथ अन्याय होगा?
लेकिन इन सभी घटनाओं को अलग-अलग करके भूल जाना भी इतिहास के साथ अन्याय होगा।
क्योंकि इनके बीच एक धागा जरूर दिखाई देता है—
भारतीय लोकतंत्र में संस्थाओं की स्वतंत्रता केवल संविधान की किताब में लिखे शब्दों से सुरक्षित नहीं होती। वह उन अधिकारियों से सुरक्षित होती है जो अपने पद की शक्ति को व्यक्ति या सरकार की शक्ति से अलग समझते हैं।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी सुरक्षा कौन है?
न प्रधानमंत्री।
न विपक्ष।
न कोई CEC।
न कोई Governor।
न कोई RBI Governor।
न कोई CBI Director।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी सुरक्षा है—
ऐसी संस्था जिसमें पदाधिकारी बदल जाएँ, लेकिन संस्थागत मर्यादा न बदले।
आज अगर कोई CEC शक्तिशाली है तो कल दूसरा CEC होगा।
आज सरकार किसी एक दल की है तो कल दूसरी सरकार हो सकती है।
लेकिन यदि नियुक्ति, मतदाता सूची, चुनाव आचार संहिता, CBI जांच और केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता जैसी संस्थागत व्यवस्थाएँ लगातार कार्यपालिका की निकटता पर निर्भर होने लगें, तो समस्या किसी व्यक्ति की नहीं रहती।
वह व्यवस्था की समस्या बन जाती है।
और इसलिए आलोक वर्मा का मामला केवल आलोक वर्मा का मामला नहीं था।
अशोक लवासा का dissent केवल अशोक लवासा का dissent नहीं था।
उर्जित पटेल का इस्तीफा केवल उर्जित पटेल का इस्तीफा नहीं था।
अरुण गोयल का अचानक जाना केवल अरुण गोयल का जाना नहीं था।
और आज चुनाव आयोग के भीतर उठ रहे सवाल केवल ज्ञानेश कुमार के बारे में सवाल नहीं हैं।
वे उस भारत के बारे में सवाल हैं जिसमें चुनाव केवल कराए नहीं जाते—बल्कि जनता को यह भरोसा भी होना चाहिए कि चुनाव कराने वाली संस्था स्वयं किसी सत्ता की अधीनस्थ संस्था नहीं है।
लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति वह नहीं होती जब कोई अधिकारी असहमति करता है।
सबसे खतरनाक स्थिति वह होती है जब किसी संस्था में असहमति करना ही असंभव हो जाए।
इसलिए इतिहास का प्रश्न ज्ञानेश कुमार से भी बड़ा है—
क्या भारत की संवैधानिक संस्थाएँ इतनी स्वतंत्र रहेंगी कि कल का कोई अधिकारी सत्ता से असहमत होकर भी अपने पद पर खड़ा रह सके?
इस प्रश्न का उत्तर किसी नेता के भाषण से नहीं मिलेगा।
उसका उत्तर संस्थाओं के आचरण से मिलेगा।
और लोकतंत्र में आखिरकार जनता केवल वोट नहीं देती—
वह संस्थाओं पर अपना विश्वास भी देती है।
उस विश्वास की रक्षा किसी सरकार की कृपा नहीं,संवैधानिक मर्यादा का दायित्व है।*गौतम राणे सागर* राष्ट्रीय संयोजक संविधान संरक्षण मंच।